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चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को हम भारतीय नववर्ष के रूप में मनाते हैं। इसके कई कारण हैं, लेकिन सबसे प्रमुख कारण यह है कि इसी तिथि को एक अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हजार एक सौ बारह वर्ष पूर्व पृथ्वी का जन्म हुआ था। भारतीय काल गणना के इस आंकड़े को अब पाश्चात्य खगोलशास्त्री भी सही अब मानने लगे हैं। हमारे देश में यों तो कई संवतों का प्रयोग होता है लेकिन विक्रमी संवत सर्वाधिक प्रचलित है। यह आश्चर्यजनक है कि हम भारतीय भी उस ईसवी सन के प्रथम दिवस एक जनवरी को नए वर्ष के रूप में धूमधाम से मनाते हैं जिसकी न तो खगोलीय प्रतिष्ठा है, न प्राकृतिक अवस्था और न ही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि। जबकि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा इन सभी दृष्टियों से काल गणना की कसौटी पर खरी उतरती है। पाश्चात्य विचारक यह साबित करने में लगे थे कि भारत का अतीत अंधकारमय रहा है। इसका कारण भी था। दो हजार वर्ष पूर्व तक असभ्यों की तरह जीवन व्यतीत करने वालों को यह कैसे विश्र्वास हो सकता था कि दुनिया में उनसे पूर्व भी सभ्य लोग थे। उन्होंने सभ्यता को ईसा मसीह के जन्म से आगे-पीछे जोड़कर आकलन किया। हम ग्रेगेरियन पंचांग का अनुसरण करते हैं जो विश्र्व के वृहत्तर भाग में प्रचलित है। केवल यह बिंदु इसे महत्वपूर्ण बना देता है कि यह सबसे अधिक प्रचलित है। इसमें बहुत से गुण हैं तथापि कुछ दोष भी हैं जो इसे उपयोग के लिए असंतोषजनक बना देते हैं। जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में पंचांग सुधार समिति का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष मेघनाथ साहा थे। वह परमाणु वैज्ञानिक थे। समिति के सदस्यों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एससी बनर्जी, गणित विभाग के अध्यक्ष गोरख प्रसाद, वकील केएल दफ्तरी, मराठी दैनिक के संपादक जेएस करंडीकर, गणित अध्यापक आर.बी. वैद्य इसमें शामिल थे। एनसी लाहड़ी इसके सचिव थे। इस समिति में एक भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो भारत की ज्योतिष विद्या का ज्ञान रखता हो। 


यही नहीं, प्रो. मेघनाथ साहा भारतीय काल गणना के सूर्य सिद्धांत के सर्वथा विरोधी थे। उनकी सहमति उन पाश्चात्य विद्वानों से थी जो ज्योतिष को मूर्खतापूर्ण मानते थे। इस समिति में हमारे धर्मशास्त्रों का भी कोई ज्ञाता नहीं था। इस समिति ने जो पंचांग बनाया उसे ग्रेगेरियन कलेंडर के अनुरूप ही बारह मासों में बांट दिया गया। अंतर केवल उनके नामकरण में रखा। अर्थात जनवरी, फरवरी आदि के स्थान पर चैत्र, बैशाख आदि। लेकिन महीनों के दिवसों की गणना ग्रेगेरियन कलेंडर के आधार की गई। उन्होंने सूर्य, चंद्रमा तथा पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करने के आधार पर जो सौर और चंद्र वर्ष बनता है, उसकी पूरी तरह उपेक्षा कर दी। इसकी अवैज्ञानिकता इसी से प्रमाणित है कि इसमें सौर-चंद्र मास की भांति तिथियों की गणना करने, शुक्ल कृष्ण पक्ष को स्वीकार करने तथा सूर्य व चंद्रग्रहण की तिथियां निश्चित करने का कोई प्रावधान नहीं है। सूर्य कब उत्तरायण होगा और कब दक्षिणायन इसका तो संज्ञान भी नहीं लिया गया। औपचारिक रूप से सरकारी दस्तावेजों में इस शक संवत का उल्लेख होने के अलावा उसका किसी ने भी संज्ञान नहीं लिया। भारतीय नव वर्ष का प्रथम दिवस चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पृथ्वी की उत्पत्ति, ब्रह्मा की काल गणना का प्रारंभ, नवरात्र के प्रथम दिवस, राम के राज्यारोहण, युद्धिष्ठिर के राज्यरोहण, विक्रमादित्व द्वारा आक्रांता शको को खदेड़ने तथा स्वामी दयानंद द्वारा आर्य समाज की स्थापना आदि से जुड़ा है। पृथ्वी और चंद्रमा की भांति सूर्य की दिशा ऋतुओं के परिवर्तन पर आधारित हमारी काल की गणना पूर्णत: वैज्ञानिक होने के कारण सर्वथा दोषरहित है। हमारे वैज्ञानिकों ने समय की सबसे बड़ी इकाई कल्प को माना है। एक कल्प में 432 करोड़ वर्ष होते हैं। एक हजार महायुगों का एक कल्प होता है। इसी के आधार पर मनवंतर या चतुर्युग की समय सारणी बनाई गई है। इस समय स्वेत बाराह कल्प चल रहा है। इस कल्प का वर्तमान वैवस्वत्‍‌नाम के सातवां मनवंतर है। वैवस्वत मनवंतर के 71 महायुगों में से 27 बीत चुके हैं। 28वीं चतुर्युगी के सतयुग, त्रेता द्वापर बीतकर अब कलियुग का 5118वां वर्ष चल रहा है। अभी तक विश्र्व भर के वैज्ञानिक जो भी अनुसंधान कर सके हैं उससे हमारी कालगणना की प्रामाणिकता स्वीकृत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नव वर्ष मनाने के साथ-साथ भारतीय पुनर्जागरण का अभियान प्रारंभ करने की भी आवश्यकता है।